दोस्त मेरे...मेरे जीवनसाथी

दोस्त मेरे..मेरे जीवनसाथी..

हैं तो यूं कई रिश्ते तुमसे..

पर दोस्ती का एहसास तुमसे ..

हर रिश्ते से बढ़कर चाहती..।

मेरी बातों को वरा जब तुमने..

और सहज संसार बने..।

पति तो रिश्ता औपचारिक था..

दोस्त बने जब,अलौकिक सा प्यार बने..।

किलकारियों ने जोड़े रिश्ते ..

एक नया अनुभव आया..।

जिम्मेदारियों को साझा किया हमने..

तुमने तथाकथित परंपरा कह कर..

नहीं मदद से कभी जी चुराया..।

नई परम्परा नए संदर्भ जब तुमने दिए..

परमेश्वर तो आवश्कता वश थे तुम..

मित्रवत हुए तो..हृदयेश्वर बने..।

जब जब तुम कोमल हुए..

और सशक्त मुझे किया..।

बन गए तुम उस उस पल..

हर जन्म के मनचाहे पिया..।।

ढूंढे कहां एहसास अपनेपन का..

ढूंढे कहां एहसास अपनेपन का..
मिट गया है जो अब चलन मन का..।
अब नहीं मिलेगा कोई मासूम सा मन.
जज़्बात हो गए हैं जो तिनका तिनका..।
मैं जो अनुरागी हो भी जाऊं..
कहां से मैं अनुरागित मन पाऊं..!
हर कोई है अपने अपने स्वार्थ लिए..
कोई नहीं है यहां निश्चल सा..।
मैं अपना लेती हूं सहर्ष ही..
हर कोई अपना लगता है..।
फिर खुलते हैं छुपे हुए मतलब..
हर कोई बस छलता है..।
कोई नहीं मिलता यहां अपना सा..।
फिर भी आशावान मन मेरा..
कोई अवश्य होगा..निश्चल और सहज..
बदलाव का दौर है..और है ये एक वक्त महज..।।


कब्र पर उग आते हैं पुष्प जो..

कब्र पर उग आते हैं पुष्प जो..

कहते हैं ...ये है जीवन जो....

अन्तिम नहीं हैं .....शेष हैं..

रहेगा सदा..........सर्वथा..।

आज अंतिम स्वास है केवल..

एक यंत्र ....एक तंत्र की....।

जीवन कड़ी है केवल..

उस आत्मा स्वतंत्र की...।

आत्मा मेरी और तुम्हारी..

जान लो हृदय श्री..

त्याग भी देंगे ये सरवर जो..

मिलेंगे तुमको ..

किसी ना किसी रूप में ..

कहीं ना कहीं..।।


उस तलब की तलब क्या करना..

उस तलब की तलब क्या करना..

कि तलब का मतलब ना रहे..।

रहे जमीन अपनी..और पैर भी..

दुनिया हो पूरी..चीज़ों से भरी..

लेकिन तलबगार इन सब का..

तन हो केवल... सर ना रहे..।

देखो तो पाओगे ..इस तलब पे ..

मिट रहे हो..लेकिन पछताओगे..

धुंआ है..शौक तुम्हारा जो ..

धुंआ ही बन जाओगे..यू तो..।

नफ़रत ही तो है खुद से ये..

क्या चाहते हो..कोई भी सलामत ना रहे..।।

कभी कभी पतझड़ों का कोई विराम नहीं होता..

कभी कभी पतझड़ों का..
कोई विराम नहीं होता..।
गुजरते रहतें हैं...यूं तो
कई दिन सुबह और शाम ..
मुकम्मल मुकाम नहीं होता..।
मैं शायद या फिर ..
जंगलों की तरफ ..
रुख किए हुए हूं..
इधर कोई नहीं गुजरता..
किसी का इधर शायद..
एहतराम नहीं होता..।
नई कोपले निकले..
फिर अदब का माहौल हो..
जड़ में रह गया है जीवन..जो
चेहरे पर फिर रौनक ए शाम हो..।
पतझड़ों का विराम हो..।

अब तो प्रेम नहीं है..

अब तो प्रेम नहीं हैं..!
ना मन में ना जीवन में..।
था भी कभी ..तो क्या था??
प्रेम एक दुविधा था..।
लेकिन वही शायद ..
प्रेम सर्वथा था..।
शब्दों के स्पर्श थे..
नैनों के वचन थे..
अधरो के मुस्कुराने से..
देखते थे तुम्हें..
प्रेम था मुझे तुमसे..।
जब कुछ भी नहीं सहज था..
मन कौतूहल मचाता था..।
देखने की उत्कंठा थी मात्र..
छूने से प्रेम डर जाता था..।
प्रेम था सहसा उपजा ..।
कोई वहां प्रयोजन नहीं था..।
अब है तो क्या है..!!
मन शांत..कौतूहल शांत..
प्रेम अशांत है किन्तु..
एक खीच तान संघर्ष है..
आज प्रेम मात्र भ्रामक विमर्ष है..।।


तुम अभी गुज़रे कहां हो !!

तुम अभी गुज़रे कहां हो छलावे से..

जब गुजरना तब बताना..कैसा था !

खत्म हो गया बड़ी आसानी से जो

वो प्यार बस क्या दिखावे जैसा था..!!

तुमसे तो वो भी ना हुआ..जिसमे सवाल हो...

कैसा था..कौनसा था..जरूर कोई मलाल हो..

तुम रहने दो ये खोज बीन करना..प्यार की

ठगी ठगी सी बातें तुमसे ना फिलहाल हो..

ऐसा है ..रहने दो प्यार का पाठ पढ़ाना..

हम थे जैसे..तुम थे जैसे..ये नहीं वैसा था..

प्यार तो मिथ्या हो गया..वैसा भी ना हुआ..

अपने में कभी ...जैसा था..!!!!!!!!!!!!!

ओझल तन मन...जीवन.. हम तुम केवल बंधे बंधे.. हम राही केवल, नहीं हमराही...

ओझल तन मन...जीवन.. हम तुम केवल बंधे बंधे.. हम राही केवल, नहीं हमराही... चले आते हैं, चले जाते हैं... सुबह शाम बिन कहे सुने.. न हाथों का मेल....